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बरसात के साथ कजरी का मौसम आ गया है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की कजरी लोक गायन की वह शैली है जिसमें नवविवाहिताएं नैहर में छूट गए रिश्तों की की वेदना को स्वर देती हैं। परदेश कमाने गए पुरूषों की अकेली रह गईं स्त्रियों के लिए यह अपने अकेलेपन की अभिव्यक्ति का अवसर है। स्त्रियों द्वारा समूह में गाई जाने वाली कजरी

को ढुनमुनिया कजरी कहते है। विंध्य क्षेत्र की मिर्जापुरी कजरी में सखी-सहेलियों, भाभी-ननद के आपसी रिश्तों की खटास-मिठास के साथ सावन की मस्ती का रंग घुला होता है। बदलते समय के साथ लोकसंगीत के दूसरे प्रारूपों में तो बहुत बदलाव आए,लेकिन कजरी जस की तस रही। कजरी गीत का सबसे पुराना उपलब्ध उदाहरण तेरहवीं सदी के सूफी शायर अमीर ख़ुसरो की बहुप्रचलित रचना है - 'अम्मा मेरे बाबा को भेजो जी कि सावन आया।' भारत में अन्तिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की एक कजरी रचना 'झूला किन डारो रे अमरैया' भी बेहद प्रचलित है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ब्रज और भोजपुरी के अलावा संस्कृत में भी कजरी गीतों की रचना की है। लगभग सभी शास्त्रीय गायकों और वादकों ने कजरी की पीड़ा को सुर दिए हैं। बिस्मिल्लाह खां की शहनाई और गिरिजा देवी, विंध्यवासिनी देवी और शारदा सिन्हा के स्वर में कजरी की वेदना का उत्कर्ष है। हिंदी और भोजपुरी सिनेमा में भी कजरी गीतों का प्रयोग तो हुआ है, लेकिन ज्यादातर गीतों में कजरी की आत्मा नहीं नज़र आती। आज भी कजरी में सबसे करुण गीत शैलेन्द्र का लिखा, सचिनदेव वर्मन द्वारा संगीतबद्ध और आशा जी द्वारा गाया फिल्म 'बंदिनी' का 'अबकी बरस भेज भैया को बाबुल' को माना जाता है। आप भी एक बार फिर सुनकर देखिए !

 

Courtesy: Dhruv Gupt

नानक शाह फकीर फिल्म पर विवाद क्यों?

सिक्ख धर्म संस्थापक परमादरणीय गुरू नानक देव जी के जीवन व शिक्षाओं पर आधारित फिल्म ‘नानक शाह फकीर’ काफी विवादों में है। सुना है कि शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी और कुछ सिक्ख नेता इसे रिलीज नहीं होने देना चाहते। उनका कहना है कि गुरू नानक जी पर फिल्म नहीं बनाई जा सकती । क्योंकि उनका किरदार कोई मनुष्य नहीं निभा सकता।

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राजनीति से असली मुद्दे नदारद

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Ishika Mukherjee: new sensation

In this dreamy ideology a number of enriched vocalists have produced their remarkable stature of voice in engaging our national legacy already. Respected “Ishika Mukherjee” is one of them. She is the real iconic personality our “City of Joy”, Kolkata has ever produced not only to enlist her leading articulations but to pay her

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