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पिछली रात दिल का दौरा पड़ने से देश की महानतम शास्त्रीय गायिकाओं में एक 88-वर्षीय गिरिजा देवी का पिछली रात निधन भारतीय संगीत प्रेमियों के लिए सदमें जैसा है।कल तक वे अपनी पीढ़ी की अंतिम जीवित गायिका थीं। बनारस घराने की इस विलक्षण गायिका को ठुमरी और दादरा जैसी उपशास्त्रीय और लोक गायन की शैलियों को लोकप्रियता का शिखर देने का श्रेय जाता है।

अपनी कुछ पूर्ववर्ती और समकालीन गायिकाओं गौहर जान, जानकी बाई, रसूलन बाई, मोतीबाई, सिद्धेश्वरी देवी और निर्मला देवी के साथ मिल कर भारतीय परिदृश्य में वे उपशास्त्रीय गायिकी का एक संपूर्ण संसार रचती हैं। बनारस में संगीतप्रेमी जमींदार पिता रामदेव राय के घर जन्मी गिरिजा देवी को संगीत की आरंभिक शिक्षा उनके पिता से और उसके बाद सरजू प्रसाद मिश्रा और श्री चंद मिश्रा से मिली। उनकी संगीत यात्रा आल इंडिया रेडियो, इलाहाबाद से आरंभ हुई। 1951 में उन्होंने पहली बार सार्वजनिक मंच पर गाया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। ख़याल, ठुमरी, दादरा में तो उन्हें महारत हासिल थी ही, बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोक-धुनों पर आधारित उनकी कजरी, चैता, पूरबी और होरी गीतों ने उन्हें वह प्रचंड लोकप्रियता दिलाई जो किसी भी शास्त्रीय गायक के लिए दुर्लभ होती है। भारतीय शास्त्रीय संगीत के समकालीन परिदृश्य में वे अकेली ऐसी गायिका थीं जिन्हें पूरब अंग की गायकी के लिए विश्वव्यापी प्रतिष्ठा हासिल है।
गिरिजा देवी को 'ठुमरी की रानी' कहा जाता है। ठुमरी उनके लिए गायिकी के चमत्कार से ज्यादा वह माध्यम था जिसमें वे खुद को अभिव्यक्त कर सकती थीं। प्रेम की लालसा, विरह का ताप और भक्ति की ऊंचाई उनकी ठुमरी की मूल भावनाएं रहीं जिसे उन्होंने परंपरा से अलग एक व्यक्तिगत रंग भी दिया है। ख्याल गायन से किसी कार्यक्रम का आरंभ करने वाली गिरिजा देवी जब ठुमरी पर आती थी तो संगीत की कोई भी महफ़िल जीवंत हो उठती थी। संगीत की साधना को वे तपस्या मानती थी। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था - 'मैं भोजन बनाते हुए रसोई में अपनी संगीत कि कॉपी साथ रखती थी और तानें याद करती थी। कभी-कभी रोटी सेकते वक़्त मेरा हाथ जल जाता था, क्योंकि तवे पर रोटी होती ही नहीं थी। मैंने संगीत के जुनून में कई बार उंगलियां जलाई हैं।' जीवन के अंतिम दिनों तक गायन और रियाज़ उन्होंने नहीं छोड़ा। उनकी गाई हुई कुछ लोकप्रिय बंदिशें हैं - बाजूबंद खुल खुल जाए, हमसे नजरिया काहे फेरी हो बालम, पूरब मत जइयो राजा जी,सांची कहो मोसे बतिया, अबहू न आए श्याम, बरसन लागी बदरिया, दगा देके परदेश सिधारे, चढ़त चैत चित लागे न रामा, चैत मासे चुनरी रंगाई हो रामा, खेल गए रंग होरी आदि। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, अमज़द अली खान और शोभा गूर्टू के साथ उनकी कई युगलबंदियां हिन्दुस्तानी संगीत की अनमोल धरोहर हैं। गिरिजा देवी ने खुद को केवल मंच-प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि संगीत के शैक्षणिक और शोध कार्यों में भी ख़ासा योगदान किया। अपनी लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने के बाद उन्होंने कोलकाता के आई.टी.सी.संगीत रिसर्च एकेडमी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में रहकर शोध कार्य भी कराए और योग्य शिष्यों की एक पीढ़ी भी तैयार की।
इस समर्पित संगीत-साधिका के अवसान पर नमन और श्रद्धांजलि !

 

Courtesy: Dhruv Gupt

नीरव मोदी, गुप्ता बंधु और नरेश गोयल में क्या समान है ?

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श्रीमती चौधरी की हंसी !

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i-Proclaim Annual Research Award, 2017

It is indeed an astounding pleasure to convey that i-Proclaim 3rd Annual Research Conference (About Business, Humanity and Law) has already been organized on 31st December, 2017 at Mini Auditorium, IIUM in Kuala Lumpur, Malaysia. This prestigious international event has provided the scholarly academic platform

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