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ईरान के इकतीस साल के सबीर हका की कविताओं ने दुनिया भर में सुर्खियां बटोरी हैं। युवा सबीर पेशे से ईंट ढोने वाले मजदूर हैं जिनके पास सड़कों के अलावा सोने को कोई जगह नहीं है। संघर्षों से उपजी उनकी कविताएं अपनी सादगी, संवेदना और शब्दों के पीछे छुपी करुणा की वज़ह से पढ़ने वालों पर गहरा असर छोड़ती हैं। ईरान में शब्दों पर अभी ज़ारी सेंसरशिप

के बीच भी सबीर की कविताओं को व्यापक स्वीकार्यता मिली है। हाल में मिली तमाम शोहरत के बावज़ूद वे खुद को एक थका हुआ कवि मानते हैं। एक इंटरव्‍यू में उन्होंने कहा - 'मैं थका हुआ हूं। बेहद थका हुआ। मैं पैदा होने से पहले से ही थका हुआ हूं। मेरी मां मुझे अपने गर्भ में पालते हुए मज़दूरी करती थी। मैं तब से ही एक मज़दूर हूं। मैं अपनी मां की थकान महसूस कर सकता हूं। उसकी थकान अब भी मेरे जिस्‍म में है।' प्रस्तुत है उनकी कुछ कविताएं जिनका अंग्रेजी से अनुवाद कवि गीत चतुर्वेदी ने किया है।

इकलौता डर /

जब मैं मरूंगा 

अपने साथ अपनी सारी प्रिय किताबों को ले जाऊंगा 

अपनी क़ब्र को भर दूंगा 

उन लोगों की तस्‍वीरों से जिनसे मैंने प्‍यार किया. 

मेर नये घर में कोई जगह नहीं होगी 

भविष्‍य के प्रति डर के लिए

मैं लेटा रहूंगा. मैं सिगरेट सुलगाऊंगा 

और रोऊंगा उन तमाम औरतों को याद कर 

जिन्‍हें मैं गले लगाना चाहता था

इन सारी प्रसन्‍नताओं के बीच भी 

एक डर बचा रहता है : 

कि एक रोज़, भोरे-भोर 

कोई कंधा झिंझोड़कर जगाएगा मुझे और बोलेगा - 

'अबे उठ जा सबीर, काम पे चलना है'।

सरहदें /

जैसे कफ़न ढंक देता है लाश को 

बर्फ़ भी बहुत सारी चीज़ों को ढंक लेती है. 

ढंक लेती है इमारतों के कंकाल को 

पेड़ों को, क़ब्रों को सफ़ेद बना देती है

और सिर्फ़ बर्फ़ ही है जो 

सरहदों को भी सफ़ेद कर सकती है।

दोस्‍ती /

मैं (ईश्‍वर) का दोस्‍त नहीं हूं 

इसका सिर्फ़ एक ही कारण है 

जिसकी जड़ें बहुत पुराने अतीत में हैं : 

जब छह लोगों का हमारा परिवार 

एक तंग कमरे में रहता था

और (ईश्‍वर) के पास बहुत बड़ा मकान था 

जिसमें वह अकेले ही रहता था।

मृत्‍यु /

मेरी मां ने कहा 

उसने मृत्‍यु को देख रखा है 

उसके बड़ी-बड़ी घनी मूंछें हैं 

और उसकी क़द-काठी 

जैसे कोई बौराया हुआ इंसान.

उस रात से 

मां की मासूमियत को 

मैं शक से देखने लगा हूं।

शहतूत /

क्‍या आपने कभी शहतूत देखा है, 

जहां गिरता है, उतनी ज़मीन पर 

उसके लाल रस का धब्‍बा पड़ जाता है. 

गिरने से ज़्यादा पीड़ादायी कुछ नहीं. 

मैंने कितने मज़दूरों को देखा है 

इमारतों से गिरते हुए, 

गिरकर शहतूत बन जाते हुए।

अनुवाद - गीत चतुर्वेदी

 

Courtesy: Dhruv Gupt

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