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लोक चेतना की राष्ट्रीय मासिक पत्रिका 'सबलोग' (संपादक किशन कालजयी) के जुलाई अंक में मेरे नियमित स्तंभ 'खुला दरवाज़ा' में इस बार पढ़िए मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब की बड़ी बेटी और मध्ययुग की बेहतरीन शायरा जेबुन्निसा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर मेरा आलेख ! मिर्ज़ा ग़ालिब के पहले जेबुन्निसा ऐसी अकेली शायरा थी जिसके दीवान 'दीवान-ए-मख्फी'

की पांच हज़ार से ज्यादा गजलों, शेरों और रूबाइयों के अनुवाद अंग्रेजी, जर्मन और फ्रेंच समेत कई विदेशी भाषाओं में हुए हैं। दुर्भाग्य से उसके अपने देश में ही उसकी रचनाओं का प्रकाशन और मूल्यांकन होना बाकी रह गया है। मित्रों की सुविधा के लिए आलेख की टंकित प्रति नीचे दे रहा हूं। पत्रिका 'सबलोग' को पाने और उससे जुड़ने के लिए ईमेल पते This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. पर संपर्क करें !
मुग़ल सम्राट औरंगजेब भारतीय इतिहास का सबसे विवादास्पद व्यक्तित्व रहा है। अंग्रेज इतिहासकारों ने उसे एक कट्टर, धर्मांध, शुष्क और हृदयहीन शासक के रूप में चित्रित किया और भारतीय इतिहासकारों ने उनका अंध अनुगमन। औरंगज़ेब के बारे में इसके विपरीत दृष्टि रखने वाले इतिहासकारों की भी कमी नहीं है। सच्चाई बहुत उलझी हुई है, लेकिन तमाम विरोधाभासों के बीच उसके व्यक्तित्व का एक छुपा हुआ पहलू यह है कि अपने व्यक्तिगत जीवन में वह एक विलक्षण संगीतप्रेमी और कवि रहा था। लेखक निकोलो मनुक्की ने अपनी किताब 'स्टोरिया डि मोगोर' में औरंगजेब के दरबार की कुछ संगीत सभाओं का वर्णन किया है। उसे ध्रुपद संगीत प्रिय था और उसके दरबार में खुशहाल खां, बिसराम खां, सुखीसेन, किशन खां, हयात रंग खां, मृदंग राय जैसे उस समय के विख्यात ध्रुपद गायक हुआ करते थे। औरंगज़ेब खुद एक कुशल वीणावादक था। इस किताब के अनुसार औरंगज़ेब एक कवि भी था और ध्रुपद के लिए बन्द लिखा करता था। संगीतज्ञ शेख मुहीउद्दीन याहिया मदनी चिश्ती उसके उस्ताद थे जिन्हें वह हर माह एक हजार रुपए भेजता था। संगीतज्ञ खुशहाल खां ने अपनी एक रचना में संगीतप्रेमी औरंगजेब को 'औलिया' और 'जिन्दापीर' तक कहकर संबोधित किया है - 'आयौ आयौ रे महाबली आलमगीर / जाकी धाक देखे कोउ धरे न धीर / चकतावंस सुलितान औरंगजेब / साहिन में साहि औलिया जिन्दपीर' ! औरंगजेब के काल में उसकी सहायता से संगीत के कई बहुमूल्य ग्रंथ लिखे गए, जिनमें प्रमुख थे - मिर्ज़ा रोशन मीर का 'संगीत पारिजात' तथा इबाद मुहम्मद कामीलखानी के 'असामीसुर' और 'रिसाला अमलेबीओ ठाठ रागिनी'।
औरंगज़ेब के दोहरे व्यक्तित्व का भावनात्मक पक्ष उसकी बड़ी बेटी जेबुन्निसा को विरासत में मिला था। मुग़ल खानदान में उसके आखिरी शासक बहादुर शाह ज़फर के अलावा जेबुन्निसा ही ऐसी शख्स थी जिसकी शायरी को दुनिया भर में बेहद सम्मान के साथ पढ़ा और याद किया जाता है। वह सत्रहवी सदी की सबसे चर्चित शायरा रही थी। रूमान और असफल प्रेम की पीड़ा उसकी शायरी के केंद्र में है। सूफीवाद की रहस्यमयता भी उसकी शायरी में जहां-तहां मौजूद है। मिर्ज़ा ग़ालिब के पहले जेबुन्निसा ऐसी अकेली शायरा थी जिसके दीवान 'दीवान-ए-मख्फी' की गजलों, शेरों और रूबाइयों के अनुवाद अंग्रेजी, जर्मन और फ्रेंच समेत कई विदेशी भाषाओं में हुए हैं। दुर्भाग्य से उसके अपने देश में उसकी रचनाओं का प्रकाशन और मूल्यांकन होना बाकी रह गया है।
1639 ई. में जन्मी जेबुन्निसा औरंगज़ेब और उसकी बड़ी बेगम ईरान के सफ़ाविद राजवंश की राजकुमारी दिलरस बानो उर्फ़ रबिया दुर्रानी की बड़ी संतान थी। बचपन से ही बेहद प्रतिभाशाली और होनहार जेबुन्निसा ने हफीजा मरियम नाम की शिक्षिका से तालीम पाया था। तीन साल में उसने कुरान को कंठस्थ कर लिया। सात साल की उम्र में वह हाफिज बन गई थी। फारसी और अरबी भाषाओं के अलावा दर्शन, खगोल विज्ञान और साहित्य भी सीखा। अपने पिता की तरह वह विभिन्न लिपियों के सुलेख की कला में वह दक्ष हुई। उसकी शैक्षणिक उपलब्धियों का जश्न खुद औरंगज़ेब ने बड़ी धूम धाम से मनाया था। बचपन में उसे पिता के अलावा चाचा दारा शिकोह का बेपनाह प्यार मिला था। दारा की सोहबत में उसकी दिलचस्पी साहित्य और सूफी विचारधारा में बढ़ी। शाहज़हां की इच्छा से कम उम्र में ही उसकी मंगनी उसके चाचा दारा शिकोह के पुत्र तथा अपने चचेरे भाई सुलेमान शिकोह से हो गई, किंतु सुलेमान शिकोह की असमय मृत्यु की वज़ह से यह विवाह संभव नहीं हो सका। औरंगज़ेब जब गद्दीनशीन हुआ तब जेबुन्निसा की उम्र इक्कीस साल की थी। वह अपनी बेटी की विद्वता और विचारों से इतना प्रभावित था कि अक्सर शासकीय मामलों में उसकी सलाह लिया करता था। अपने पिता के ऐसे भरोसे की वज़ह से वह हरम की भीतरी सियासत और साजिशों का शिकार भी बनी। लेकिन जेबुन्निसा की मंज़िल कुछ और ही थी।
दारा शिकोह की हत्या के बाद जेबुन्निसा के जीवन का वह अध्याय शुरू हुआ जिसकी कल्पना खुद औरंगज़ेब को नहीं रही होगी। वैसे तो उसने चौदह साल की उम्र में ही 'मख्फी' उपनाम से फ़ारसी में शेर, ग़ज़ल और रुबाइयां कहनी शुरू कर दी थी, लेकिन चाचा दारा की हत्या और पिता की राजकाज में व्यस्तता के बाद उसने अपना सारा समय अदब को देना शुरू कर दिया। तब महल में ऐसा कोई नहीं था जिसे वह अपनी रचनाएं सुना और सलाह ले सके। उसके एक उस्ताद बयाज़ ने एक बार उसकी कुछ कविताएं पढ़ ली और उसे लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। औरंगज़ेब के कठोर अनुशासन की वज़ह से दरबार में मुशायरों पर पूरी तरह प्रतिबंध था। कभी-कभी संगीत की निज़ी महफ़िलें ज़रूर लगती थी। उसे किसी ने शहर में अक्सर आयोजित होने वाले मुशायरों के बारे में बताया तो वह अपना परिचय छुपाकर 'मख्फी' नाम से अदब की गोपनीय महफ़िलों में शिरक़त करने लगी। इन मुशायरों में उस दौर के चर्चित फ़ारसी शायर गनी कश्मीरी, नामातुल्लाह खान और अकिल खान रज़ी जैसे लोग भाग लेते थे। अपनी रूमानी शायरी की वज़ह से जेबुन्निसा की लोकप्रियता बढने लगी। मुशायरों के दौरान शायर अक़ील खां रज़ी से उसका परिचय हुआ। उनकी अदबी मुलाक़ातें धीरे-धीरे व्यक्तिगत मुलाकातों में बदलीं। फिर छिप-छिप कर दोनों के मिलने का सिलसिला शुरू हुआ। उनकी मुहब्बत की चर्चा अंततः दरबार तक पहुंची तो कट्टर और अनुशासनप्रिय औरंगज़ेब को अपनी बेटी का यह प्रेम बिल्कुल पसंद नहीं आया। वैसे भी मुग़ल सल्तनत अपनी बेटियों के प्रति ज़रुरत से कुछ ज्यादा ही अनुदार रहा है। औरंगज़ेब ने जेबुन्निसा को दिल्ली के सलीमगढ़ किले में कैद कर दिया। अविवाहित जेबुन्निसा की ज़िन्दगी के आखिरी बीस साल इसी सलीमगढ़ किले की तन्हाई में ही गुज़रे। क़ैद के मुश्किल और अकेले दिनों में उसकी शायरी परवान चढ़ी।
कैद में ज़ेबुन्निसा को जो सालाना भत्ता मिलता था, उसका बड़ा भाग वह विधवाओं तथा अनाथों की सहायता करने और हर साल कुछ ज़रूरतमंद लोगों को हज पर भेजने में खर्च किया करती थी। भत्ते का कुछ हिस्सा विद्वानों और लेखकों को प्रोत्साहन देने में लगता था। बड़ी कोशिशों से उसने सलीमगढ़ किले में एक दुर्लभ पुस्तकालय तैयार किया। उस पुस्तकालय में कुरान, बाइबिल, हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मग्रंथ, ग्रीक पौराणिक कथायें, फारसी ग्रंथ, अल्बरूनी का यात्रा वृत्तांत, साहित्यिक और अपने पूर्वजों के बारे में लिखी गईं कई किताबें संग्रहित थीं। चाचा दारा शिकोह के काम को आगे बढाते हुए उसने सुंदर अक्षर लिखने वालों से कई दुर्लभ तथा बहुमूल्य, लेकिन नष्टप्राय पुस्तकों की नकल करवा कर उन्हें सुरक्षित किया। अदब के कुछ विद्वानों को वेतन पर रख कर कुछ अरबी ग्रंथों का फ़ारसी में अनुवाद कराया। उनमें से एक ग्रन्थ है अरबी 'तफ़सीरे कबीर' का 'जेबुन तफ़ासिर' नाम से फ़ारसी में अनुवाद।
क़ैद के दिनों में सार्वजनिक कामों से बचा हुआ तमाम समय वह कविताएं लिखने में बिताती थी। अपने जीवन के आखिरी दिनों में उसने मुल्ला सैफुद्दीन अर्दबेली की सहायता से अपने दीवान 'दीवान-ए-मख्फी' की पांडुलिपि तैयार कराई जिसमें उनकी पांच हज़ार से ज्यादा ग़ज़लें, शेर और रुबाइयां संकलित थीं। कविताओं की उसकी इस विशाल विरासत का पता 1702 में उसकी मौत के बाद चला। बाद में फ़ारसी और अंग्रेजी के किसी विद्वान ने दीवान की पांडुलिपि पेरिस और लंदन की नेशनल लाइब्रेरियों में पहुंचा दिया जहां वे आज भी सुरक्षित हैं। साहित्यकारों की नज़र इनपर पड़ी तो धीरे-धीरे दुनिया की कई भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ। सैकड़ों साल बाद दिल्ली में 1929 में और तेहरान में 2001 में फ़ारसी में ही इस दीवान का प्रकाशन हुआ। दुर्भाग्य से उर्दू और हिंदी में जेबुन्निसा की इस अनमोल अदबी विरासत का मूल्यांकन तो दूर, उसका अनुवाद तक नहीं हो पाया है। प्रस्तुत है जेबुन्निसा की एक रूबाई का मेरे द्वारा अंग्रेजी से किया गया अनुवाद।
वो नज़र जब मुझपर गिरी थीं
पहली बार
मैं सहसा अनुपस्थित हो गई थी
वह तुम्हारी नज़र नहीं
खंज़र थी शायद
जो मेरे जिस्म में समाई
और लहू के अदृश्य धब्बे लिए
बाहर निकल आई थी
आप गलत सोच रहे हो, दोस्त
यह कोई दोज़ख नहीं, जन्नत है
मत करो मुझसे
अगले किसी जन्म का वादा
वर्तमान के तमाम दर्द
और सभी बेचैनियां लिए
जज़्ब हो जाओ मुझमें इसी पल
मत भटकाओ मुझे काबे के रास्तों में
वहां नहीं
यहीं कहीं मिलेगा खुदा
किसी चेहरे से झरते नूर
किसी नशीले लम्हे की खूबसूरती में
वहीं, बिल्कुल वहीं कहीं
मिल जाएगी पाकीज़गी
जहां तुम सौप दोगे
अपनी बेशुमार ख्वाहिशें
मुझे, अपनी जेबुन्निसा को
जो जाने कितनी सदियों से
तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही है !

Courtesy: Dhruv Gupt

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