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जीएसटी ने रंग दिखाना शुरू कर दिया है। इसके लिए छोटे उद्योग और छोटे व्यापार करने वालों का बड़ा तबका रजिस्टेशन और काम धंधे का हिसाब किताब रखने और हर महीने सरकार को जानकारी देने के लिए कागज पत्तर तैयार करने में लग गया है। इसका तो खैर पहले से अंदाजा था। लेकिन दसियों टैक्स खत्म करके एक टैक्स करने का जो एक फायदा गिनाया गया था कि

वस्तु और सेवा पर कुल टैक्स कम हो जाएगा और चीजें सस्ती हो जाएंगी, वह होता नज़र नहीं आया। बल्कि अपनी प्रवृति के अनुसान बाजार ने जीएसटी के बहाने अपनी तरफ से ही ज्यादा बसूली और शुरू कर दी। कानूनी और वैध तरीके अपनी जगह हैं लेकिन देश का ज्यादातर खुदरा व्यापार अभी भी असंगठित क्षेत्र में ही माना जाता है। सो जीएसटी के लक्ष्य हासिल होने में अभी से किंतु परंतु लगने लगे हैं। जीएसटी की आड़ लेकर आम जनता से ज्यादा दाम की अधोषित वसूली पहले दिन से ही शुरू हो गईं।

जीएसटी लाए जाने का कारण और उसके असर का अंदाजा लगाया जाना जरूरी हो गया है। खासतौर पर इसलिए और जरूरी है क्योंकि नोटबंदी के विस्फोटक फैसले को हम पहले ही सदी का सबसे बड़ा कदम साबित करने में लगे थे। उसका असर का हिसाब अभी लग नहीं पाया। इसीबीच सदी का सबसे बड़ा टैक्स सुधार का धमाका और हो गया। स्वाभाविक रूप् से ऐसे फेसलों का चैतरफा और जबर्दस्त असर होने के कारण इसे चर्चा के बाहर करना मुश्किल होगा। नाकामी की सूरत में तो हायतौबा मचेगी ही लेकिन कामयाबी के बावजूद इसका प्रचार करने में बड़ी दिक्कत आएगी । इसका कारण यह कि जनता सबसे पहले यह देखती है कि उसे सीधे सीधे क्या मिला। जबकि नोटबंदी और जीएसटी में एक समानता यह थी कि इसमें आम जनता के लिए सीधे साीधे पाने का आश्वासन नहीं था। बल्कि अप्रत्यक्ष हासिल यह था कि बड़े लोगों की मौज कम हो जाएगी।

नोटबंदी से बड़े लोगों की मौज कितनी कम हुई इसका अभी  पता नहीं है। भ्रष्टाचार पर क्या असर पड़ा इसका ठीक ठीक आकलन होने में लंबा वक्त लगेगा। सो नोट बंदी के नफे नुकसान का हिसाब अभी नहीं लग सकता। लेकिन जीएसटी ऐसा फेसला था जिसका असर तत्काल होना लाजिमी था। और वह हुआ।
ज्यादा से ज्यादा मुनाफे की चाह में रहने वाले बाजार की प्रवृत्ति ही होती है कि उसे दात बढा़ने के बहाने की तलाश होती है। कभी टकों की हड़ताल कभी पेटोल पंपों की तो कमी खराब  मौसम का बहाना यानी आवश्यक सामान की सप्लाई कम होने के बहाने से दाम हमेशा बढ़ाए जाते हैं। लेकिन दसियों साल बाद जीएसटी से क्रांतिकारी सुधार ने तो बाजार को जैसे सबसे बड़ा बहाना दे दिया। ठंडक में बैठकर साफसुथरे ढंग से खाने वालों को जब बिल में यह देखने को मिलता है कि 18 फीसद यानी दो सौ रूप्ए की थाली लेने में 36 रूप्ए सरकारी खजाने में चले गए तो एक बार वह खुद को यह दिलासा दे लेता है कि चलो साफसुथरी जगह खाना खाना देश के हित में काम आएगा। लेकिन जब वह ये देखता है कि इस बीच सामान के दाम भी बढ़ गए तो उसे समझ में नहीं आता कि सारे टेक्स खुद ही देने के बाद उसे अतिरिक्त पैसे किस बात के देने पड़ रहे हैं।

बड़े गौर करने की बात है कि रोजमर्रा के बहुत से सामान ऐसे हैं कि अगर औसत तबके के खरीददार को महंगे लगते हैं तो वह उसे नहीं भी खरीदता है या कम मात्रा में खरीदकर कर काम चला लेता है। लेकिन पैकेटबंद खाने की चीजें या उम्दा क्लालिटी की चीजें हमेंशा ही बेमौके भी महंगी होती जाती हैं। और उनकी बिक्री पर भी असर नहीं पड़ता। इनका इस्तेमाल करने वाला तबका इतना संपन्न है कि वह कम से कम खाने पीने में किफायत की बात बिल्कुल ही नहीं सोचता। लेकिन वहां बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है जहां तंवाकू, सिगरेट और हल्के नशे की दूसरी चीजों के दाम बढ़ने ने दसियों साल के रिकार्ड तोड़ दिए। जिन्हें लत पड़ चुकी है उनके लिए अव ये चीजें आवश्यक वस्तु की ही श्रेणी में हैं। खुदरा दुकानदार का तर्क होता है कि पैकेट या डिब्बे पर नए रेट आने वाले हैं तब तक थोक में अलग से पैसे देने पड़ रहे हैं। चलिए हफते दो हफते या ज्यादा से ज्यादा महीने दो महीने इस बहाने से ज्यादा दाम वसूली चल भी सकती है। लेकिन देखा यह गया है कि एक बार किसी भी बहाने से महंगाई बढ़ने के बाद उसे नीचे उतारने का कोई तरीका काम नहीं आता। सप्लाई का बहाना बनाकर अरहर की दाल जब चालीस से बढ़कर साठ हुई थी तो सरकार की हरचंद कोशिश के बाद वह नीचे तो आई ही नहीं बल्कि दो सौ रूप्ए तक की महंगाई छू आई।

यहां जीएसटी और महंगाई की बात एक साथ करने की तर्क यह है कि सरकारी एलानों और सरकारी इरादों में जनता से ज्यादा टैक्स की उगाही का मकसद भले न हो लेकिन बाजार में जीएसटी के बहाने अगर ज्यादा मुनाफा वसूली शुरू हो गई तो गली गली में महंगाई की चर्चा शुरू होने में देर नहीं लगेगी।

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