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राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर हिंदी की छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के ऐसे कवि थे जिनकी कविताओ में एक ओर विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति का तेज है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं और प्रेम की इतनी कोमल अभिव्यक्ति जिसकी बारीकी पढ़ने वालों को सहसा स्तब्ध कर देती है। उन्होंने 'कुरुक्षेत्र', 'हुंकार', 'रश्मिरथी', 'परशुराम की प्रतीक्षा' जैसी काव्य रचनाओं

में एक तरफ जहां सामाजिक -आर्थिक असमानता और शोषण के खिलाफ ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को आधुनिक संदर्भ देकर हमारे समय की विसंगतियों पर तीखा प्रहार किया तो दूसरी ओर 'उर्वशी' में स्वर्ग से निष्कासित एक अप्सरा उर्वशी की कथा के बहाने मानवीय प्रेम, वासना और स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की गहरी पड़ताल की। 'कुरुक्षेत्र' और 'उर्वशी' दिनकर के व्यक्तित्व के दो ध्रुव हैं और उनका अंतर्संघर्ष उनका स्वभाव।स्वर्गीय दिनकर के बाद फिर किसी हिंदी कवि को वह स्वीकार्यता, आदर और प्रचंड लोकप्रियता नसीब नहीं हुई ! कविताओं के अलावा अपनी कई कालजयी गद्य रचनाओं, ख़ासकर 'संस्कृति के चार अध्याय' में उन्होंने सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं के बीच एक राष्ट्र के रूप में भारत की बेहद तार्किक और सशक्त तस्वीर खींची है। स्वर्गीय दिनकर की जयंती (23 सितंबर) पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि, खंड-काव्य 'उर्वशी' की कुछ पंक्तियों के साथ !


इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है
सिंह से बांहें मिलाकर खेल सकता है
फूल के आगे वही असहाय हो जाता
शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता
विद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से.
मैं तुम्हारे बाण का बींधा हुआ खग
वक्ष पर धर शीश मरना चाहता हूं
मैं तुम्हारे हाथ का लीला कमल हूं
प्राण के सर में उतरना चाहता हूं !

 

Courtesy: Dhruv Gupt

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