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हमारी पृथ्वी संभवतः ईश्वर की सबसे सुन्दर रचना है। यहां प्रकृति का अथाह सौन्दर्य भी है, विविधताओं से भरा जीवन भी और जीवन के पैदा और विकसित होने की सर्वाधिक अनुकूल परिस्थितियां भी। इसका सौन्दर्य स्वर्ग के देवताओं को भी आकर्षित करता रहा है। यह हम हैं जो अपने स्वार्थ और मूर्खताओं की वज़ह से स्वर्ग से सुन्दर इस पृथ्वी को भी नर्क बनाने पर तुले हुए हैं।

प्रकृति से सामंजस्य बिठाने के बजाय हम सदियों से उससे संघर्षरत हैं। कभी सोचिए कि इस संघर्ष से हमने हासिल क्या किया है ? मनुष्य और उसका विज्ञान कितनी भी तरक्की कर ले, पृथ्वी जैसे एक ग्रह की रचना नहीं कर सकता। पर्वतों जैसी विशालता, वनों जैसी रहस्यमयता, समुद्र जैसी गंभीरता और नदियों जैसी शीतलता वह कहां से लाएगा ? झरनों, बादलों, बारिश और हरी-हरी पत्तियों पर ओस की बूंदों सा कोई तिलिस्म वह नहीं गढ़ सकता। आप ब्रह्माण्ड की जितनी भी जानकारियां हासिल कर लें, पेड़ से सुन्दर कोई कविता आप नहीं लिख सकते। पत्तों के बदन पर हवा की सरसराहट-सा कोई संगीत रचना आपके बूते की बात नहीं। आप एक फूल से बेहतर प्रेम पत्र की कल्पना नहीं कर सकते ! फूलों पर बारिश की बूंदों जैसी करुणा कहीं और देखी नहीं होगी आपने। आप जितनी भी रोशनी पैदा कर लें, दुनिया भर की बिजली मिलकर एक पूनम का एक चांद नहीं रच सकती। दुनिया के सारे चित्रकार मिलकर तितली के पंखों की शोख़ी, फूलों की जीवंतता, गिलहरी की चपलता को चित्र में नहीं ढाल सकेंगे। आकाश में उड़ने वाले हजारों विमान मिलकर भी एक पक्षी के नन्हे पंखों का मुकाबला नहीं कर सकते। दुनिया की कोई भी मशीन शीतलता का वह एहसास नहीं दे सकती जो बदन पर गिरी बारिश की चंद बूंदें छोड़ जाती हैं। हमारी लाख कोशिशें किसी के दिल में वह गुदगुदी नहीं पैदा कर सकती हैं जो बालों और बदन को सहलाकर हवा का एक झोका पल में कर जाता है। आपके सारे धर्म और दर्शन मिलकर एक बच्चे की मासूमियत को जन्म दे पाएंगे ? वह शायद इसीलिए कि प्रकृति के रूप में ईश्वर ने ख़ुद को अभिव्यक्त किया है। ईश्वर की रची इस बेपनाह सुन्दरता को नष्ट करने का हमें कोई अधिकार है ?
अपने छोटे-बड़े स्वार्थों के लिए हम जिस तरह अपनी जीवनदायिनी पृथ्वी का दोहन, ममतालु प्रकृति के साथ अनाचार और अपनी नदियों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं, वह बेहद हैरान कर देने वाला है। पृथ्वी का सौन्दर्य मिट रहा है। उसके श्रृंगार जंगल कट रहे हैं। विकास के नाम पर वृक्षों की बेरहम हत्या की जा रही है। उनकी जगह हर तरफ ईंट और उसकी जगह कंक्रीट के नए-नए जंगल उगाए जा रहे हैं। खेती की जमीन सिकुड़ती जा रही है। नदियां सूख भी रही हैं और प्रदूषित भी हो रही हैं। धरती का तापमान बढ़ रहा है। पक्षी विलुप्त हो रहे हैं। जानवरों की कई प्रजातियां इतिहास की वस्तु बनती जा रही हैं। ज़मीन बंजर हो रही है। आकाश धुंधला पड़ रहा है। अंध औद्योगीकरण की जल्दबाजी में हम हवाओं में आहिस्ता आहिस्ता जहर घोल रहे हैं। औद्योगिक क्रांति की शुरुआत से ही जिस प्रकार खनिज ईंधनों का उपभोग तेजी से बढ़ा है उसके कारण कार्बन डाइऑक्साइड जैसे जहरीले गैसों के असीमित उत्सर्जन से हवा भी प्रदूषित हो रही है और उसके असर से पृथ्वी के वातावरण में गर्मी भी बढ रही है। दुनिया भर के मौसम में भारी बदलाव खतरे का संकेत है। वैसे तो मौसम परिवर्तन का असर दुनिया भर पर पड़ रहा है, लेकिन भविष्य में भारत इससे ज्यादा प्रभावित होने वाला है। सियाचिन समेत देश के बड़े-बड़े ग्लेसियर के पिघलने से जल प्रलय भी आएगा और इसकी तटीय सीमाओं मे फेरबदल की वज़ह भारी संख्या में लोग विस्थापित भी होंगे। नदियों में खतरनाक औद्योगिक कचरों और समुद्रों में परमाणु संपन्न देशों द्वारा फेके जाने वाले परमाणविक कचरे से हालात और जटिल हुए हैं। हमारे छोटे-छोटे स्वार्थों की वज़ह से पृथ्वी से उसका सौन्दर्य ही नहीं, जीवन की परिस्थितियां भी धीरे-धीरे ख़त्म हो रही हैं। प्रकृति को चुनौती देने की ज़िद में ईश्वर की बनाई दुनिया के समानांतर जो दुनिया हम रच रहे हैं, वह अब रहने लायक भी नहीं रही। ऐसा लगता है जैसे सब कुछ हासिल कर लेने की जल्दबाजी में वे तमाम चीजें हम नष्ट किए जा रहे हैं जो जीवन की बुनियादी ज़रूरतें हैं। आज हमारी प्रकृति और पर्यावरण विकास की हमारी इस अंधी दौड़ की कीमत चुका रहे हैं। कल इसकी कीमत हमारी आने वाली पीढ़ियां चुकाएंगी। हम जिस रफ़्तार से प्रकृति को उजाड़ रहे हैं, उससे तो ऐसा लगता है कि हम अपने बाद अपनी संतानों के लिए इस ग्रह पर कुछ भी छोड़कर नहीं जाना चाहते। वह दिन दूर नहीं जब हमारे बच्चे शुद्ध पानी और हवा के एक ताज़ा झोंके के लिए भी तरस जाएंगे।
खतरे की घंटी बज रही है। आप सुनना चाहें तो हर तरफ आपको प्रलय की आहटें सुनाई देंगी। धरती के इतिहास का सबसे बड़ा संकट हमारे सामने हैं, लेकिन हैरानी यह है कि किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा। अपनी रोजी-रोटी के फेर में लगे आम लोगों को इस संकट के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं हैं। उन्हें अपनी दुनिया के भविष्य की चिंता नहीं। सरकारें इस मसले पर हमेशा की तरह संवेदनहीन हैं। देश के बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोग अपनी कुंठाएं परोसने में लगे हैं। इस आसन्न खतरे से पार पाने के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, वनों की सुरक्षा, नदियों की स्वच्छता और अविरलता के लिए प्रभावी कदमों, उद्योगों और वाहनों के लिए पारंपरिक ईंधन की जगह सौर और वायु ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा, पोलिथिन और प्लास्टिक बैग के उपयोग पर तात्कालिक प्रतिबंध जैसे कुछ उपायों पर प्राथमिकता के आधार पर अमल की ज़रुरत होगी। पर्यावरण के प्रति देश के असंवेदनशील माहौल में देश के कुछ मुट्ठी भर ही लोग ही हैं जिन्हें अपनी दुनिया और उसके भविष्य की चिंता है। जो जंगलों और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई का विरोध भी कर रहे हैं और अपने सामर्थ भर पेड़ भी लगा रहे हैं। जो पर्यावरण के लिए सबसे बड़े खतरे औद्योगिक कचरों की रिसाइकिलिंग और पोलिथिन तथा प्लास्टिक के थैलों के उपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए प्रयासरत हैं। जी अपनी जीवनदायिनी नदियों की निर्मलता और अविरलता के लिए संघर्षरत हैं। जो हवा के प्रदूषण के विरुद्ध जन जागरूकता फैलाने में लगे हैं। दुर्भाग्य यह है कि पृथ्वी को बचाने की मुहिम में लगे ये थोड़े से लोग अपने आपको अकेला पा रहे हैं। न आम लोगों का अपेक्षित सहयोग उन्हें मिल रहा है और न प्रशासन और सरकार से ज़रूरी समर्थन।
दुर्भाग्य से आज के समय में हमारे देश के लिए धर्म और सियासत सबसे बड़े मुद्दे हैं। हमारे समय का सबसे बड़ा सवाल यह होना चाहिए कि यह हमारी यह पृथ्वी कैसे बचेगी, इसका पर्यावरण कैसे बचेगा और जीवन कैसे बचेगा। यह सवाल हम सबको ख़ुद से भी पूछना होगा, अपने लोगों से भी और अपनी सरकारों से भी। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि इक्का-दुक्का और अलग-थलग प्रयासों से बात नहीं बनेगी। अपनी इस पृथ्वी को बंजर और जीवनविहीन बनाने की तमाम साजिशों के खिलाफ एक जन आंदोलन की ज़रुरत आज शिद्दत से महसूस हो रही है ! पृथ्वी बचेगी, उसका पर्यावरण बचेगा तो हम बचेंगे और हमारी आने वाली पीढियां बचेंगी। समय रहते अगर हम और आप हम नहीं जगें तो चुप बैठकर प्रलय की प्रतीक्षा करने के सिवा कुछ नहीं बचेगा हमारे पास !

Courtesy: Dhruv Gupt

The Exemplary Educational Reward

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DEMONETISATION 2016

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