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दिल्ली में मध्यकालीन मीनारें तो कई हैं, लेकिन यहां एक अल्पज्ञात मीनार ऐसा भी है जो चोरों को समर्पित है। हौज़ ख़ास के अरविंदो मार्ग पर स्थित और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित यह कलात्मक मीनार सैकड़ों साल से चोर मीनार के नाम से जाना जाता है। इस मीनार को तेरहवी सदी के अंत में शासक अलाउद्दीन खिलजी ने बनवाया था।

पत्थरों के चौकोर प्लेटफार्म पर ईंट-गारे से बनी इस मीनार में जो चीज़ सबसे अज़ीब लगती है, वह है इसमें बने दो सौ पचीस छेद। इसके निर्माण के पीछे की सबसे प्रचलित कहानी यह है कि अलाउद्दीन द्वारा इसके दो सौ पचीस छेदों में चोरों और अपराधियों के सिर काटकर उन्हें सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रखवाया जाता था। ऐसा शायद चोरों में दहशत पैदा करने के उद्देश्य से किया जाता रहा होगा। इससे अलग कुछ इतिहासकारों का मानना है कि खिलज़ी ने सैकड़ों मंगोलों की हत्या कर इस मीनार में उनके कटे सिरों की प्रदर्शनी लगाई थी। सदियों से इस मीनार का शुमार दिल्ली की कुछ बेहद भुतहा जगहों में किया जाता रहा है, हालांकि आज इस मीनार के आस-पास कई पॉश कालोनियां बसी हुई हैं।

आज अंग्रेजी के प्रख्यात कथाकार मित्र दिनेश सी अग्रवाल के साथ मीनार के भ्रमण के दौरान कुछ स्थानीय लोगों और चौकीदारों ने बताया कि आसपास घनी आबादी के बावजूद यह मीनार प्रेतग्रस्त है जहां रात के सन्नाटे में अक्सर सिसकियों और चीखों की दबी आवाजें सुनी जाती हैं। उनकी बात झूठ हो तब भी वीरान खंडहरों में ऐसी रहस्यमय आवाज़ें अब अजूबा नहीं, वैज्ञानिक सच है। ये विचित्र आवाज़ें भूत-प्रेत की नहीं होंती। आवाज़ एक ऊर्जा है और यह ऊर्जा हज़ारों साल बाद भी नष्ट नहीं होती। बस इसकी तीव्रता कम से कमतर होती चली जाती है। शोरगुल वाली जगहों से थोड़ी ज्यादा तीव्रता में ये खंडहरों के सुनसान में मौजूद रहती हैं। अब तो ऐसे उन्नत उपकरण भी हैं जिनमें सैकड़ों साल पुरानी ध्वनियां रिकॉर्ड कर सुनी जा सकती है। ये आवाज़ें बिना यंत्र के भी आप थोड़े ध्यान या एकाग्रता से अपनी चेतना का स्तर बदलकर सुन सकते हैं। कभी-कभी थकावट या नींद की झपकी की वजह से कुछ पलों के लिए जब हम चेतनाशून्य हो जाते हैं तो वातावरण में मौजूद ध्वनियां हमें सुनाई दे जाती हैं। हम भ्रम मानकर इन्हें भूल भी जाते हैं।

Courtesy: Dhruv Gupt

नानक शाह फकीर फिल्म पर विवाद क्यों?

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