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उर्दू के एक बेहतरीन शायर अनवर जलालपुरी का कल सत्तर साल की उम्र में ब्रेन हैमरेज से निधन की ख़बर अदब के चाहने वालों के लिए एक सदमे जैसा है। अपनी नाज़ुकख्याली, सघन संवेदना और मखमली आवाज़ से पिछले चार दशकों से लोगों के दिल पर राज करने वाले अनवर जलालपुरी मंचीय मुशायरों की सबसे अज़ीम शख्सियतों में एक रहे थे।

मंचों की यह लोकप्रियता उनके भीतर के संज़ीदा शायर पर इस क़दर हावी रही कि उनके जीवक-काल में उनकी शायरी का गंभीर मूल्यांकन नहीं हो सका। उन्हें मंचीय शायर, मुशायरों के जादुई संचालन और 'भगवद्गीता' का उर्दू में अनुवाद कर दो मज़हबों के बीच पुल बनाने के लिए ही ज्यादा जाना और याद किया गया। उनकी शायरी में नर्म, मुलायम लफ़्ज़ों का वह तिलिस्म, मनुष्यता का वह स्पर्श और रूमान की वह खुशबू है जो पढ़ने और सुननेवालों की संवेदना को कुरेदकर जगाती हैं। पिछली तीन पीढियों ने उनके अशआर की उंगलियां थाम कर मुहब्बत की पेंचदार गलियों की सैर की है। दुर्भाग्य से अदब में उन्हें वह मुक़ाम नहीं मिला जिसके वे वाक़ई हकदार थे। मरहूम अनवर जलालपुरी को खिराज़-ए-अक़ीदत, उनकी एक ग़ज़ल और इस उम्मीद के साथ की आने वाला वक़्त उर्दू शायरी को उनकी देन का समग्र मूल्यांकन करेगा !

रात भर इन बंद आंखों से भी क्या-क्या देखना
देखना एक ख़्वाब और वह भी अधूरा देखना

कुछ दिनों से एक अजब मामूल इन आंखों में है
कोई आये या न आये, फिर भी रस्ता देखना

ढूंढ़ना गुलशन के फूलों में उसी की शक्ल को
चांद के आईने में उसका ही चेहरा देखना

खुद ही तन्हाई में करना ख्वाहिशों से गुफ्तगू
और अरमानों की बरबादी को तन्हा देखना

तशनगी की कौन सी मंज़िल है ये परवरदिगार
शाम ही से ख़्वाब में हर रोज़ दरिया देखना !

Courtesy: Dhruv Gupt

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