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10 वर्ष तक भारतीय गणराज्य के उपराष्ट्रपति रहे, डॉ. हामिद अंसारी, अपने विदाई समारोह में भारत के अल्पसंख्यकों की तथाकथित असुरक्षा के विषय में, जो टिप्पणी करके गये, उसे लेकर भारत का बहुसंख्यक समाज बहुत उद्वेलित है। अखबारों में उनके कार्यकाल की ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख किया गया है, जब उन्होंने स्पष्टतः हिंदू समाज के प्रति,

अपने संकोच को सार्वजनिक रूप से प्रकट किया। इसलिए यहां उन्हें दोहराने की आवश्यक्ता नहीं है। सोचने का विषय यह है कि जिस देश में हर बड़े पद पर, अल्पसंख्यक इज्जत के साथ, बैठते रहे हों, वहां उनके असुरक्षित होने की बात कहना, गले नहीं उतरती। भारत का राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त, इंटेलीजेंस ब्यूरो का निदेशक जैसे अत्यंत महत्वपूर्णं व सर्वोच्च पदों पर, अनेक बार अल्पसंख्यक वर्ग के लोग, शानों-शौकत से बैठ चुके हैं।

डॉ. अंसारी से पूछा जाना चाहिए कि जब कश्मीर के हिंदुओं पर वहां के मुसलमान लगातार, हमले कर रहे थे और अंततः उन्हें उनके सदियों पुराने घरों से खदेड़कर, राज्य से बाहर कर दिया, तब क्या उन्होंने ऐसी चिंता व्यक्त की थी? मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी भी हिंदुओं पर होते आ रहे, मुसलमानों के हमलों पर, चिंता व्यक्त की हो। ये पहली बार नहीं है। हमारे देश के वामपंथी इस मामले में सबसे आगे हैं। उन्हें हिंदुओं की साम्प्रदायिकता बर्दाश नहीं होती, लेकिन मुसलमानों की साम्प्रदायिकता और आतंकवाद में उन्हें कुछ भी खोट नजर नहीं आता। तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों और वामपंथियों के ऐसे इकतरफा रवैये से ही, हिंदू समाज ने अब संगठित होना शुरू किया है।  इसलिए इन सबका सीधा हमला, अब हिंदूओं पर हो रहा है। उन्हें लगातार सम्प्रदायिक और धर्माथ कहकर, समाज विरोधी बताया जा रहा है। यही हाल बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भी है, जिन्होंने अपने अधिकारियों को अलिखित निर्देश दे रखे हैं कि उनके प्रांत में मुसलमानों के सौ खून माफ कर दिये जाये, पर अगर कोई हिंदू साईकिल की भी चोरी करते पकडा जाए, तो उसे टांग दिया जाए। इससे पश्चिमी बंगाल के पुलिस महकमे में भारी असंतोष है।

यह सही है कि भाजपा की सरकार केंद्र में आने के बाद से हिंदू युवा कुछ ज्यादा सक्रिय हो गये हैं और कभी-कभी अपने आका्रेश को प्रकट करते रहते हैं। पर इसके पीछे वो उपेक्षा और तिरस्कार है, जिसे उन्होंने पिछले 1000 साल से भोगा है।

डॉ. हामिद अंसारी जैसे लोग, इन दोनों ही वर्गों से अलग हटकर हैं। वे ऐसे कुलीन वर्ग से आते है, जिसने कभी ऐसी उपेक्षा या यात्ना सही नहीं। वे तो हमेशा से अच्छा पढे़, अच्छा खाया-पीया, ताकतवर लोगों की संगत में रहे और पूरे जीवन ऊँचे-ऊँचे पदों पर बैठे। इसलिए ऐसे लोगों से तो कम से कम संतुलित व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। फिर क्यों ये नाटक देखने को मिलते रहते है। होता ये है कि ऐसे कुलीन लोग, आम आदमी के मुकाबले ज्यादा खुदगर्ज होते हैं। जब तक इन्हें मलाई मिलती रहती है, तब तक ये सीधे रस्ते चलते हैं। पर जैसे ही इन्हें लगता है कि अब मलाई उड़ाने का वक्त खत्म हो रहा है, तो ये ऐसे ही बयान देकर, चर्चा में आना चाहते हैं, जिससे और फोरम पर मलाई खाने के रास्ते खुल जायें। इसलिए इनके बयानों में कोई तथ्य नहीं होता। इन्हें गंभीरता से लेना भी नहीं चाहिए।

सोचने की बात ये है कि जब देश की आम जनता, बुनियादी समस्याओं से जूझ रही हो, तब इस तरह के साम्प्रदायिक मुद्दे उठाना, कहां तक जायज है। फिर वो चाहे, कोई भी पक्ष उठाये। आम जनता जानती है कि अचानक साम्प्रदायिक मुद्दे उठाने के पीछे केवल राजनैतिक ऐजेंडा होता है, उस समुदाय विशेष के विकास करने का नहीं। इसलिए ऐसे बयान निजि राजनैतिक लाभ के लिए दिये जाते हैं, समाज के हित के लिए नहीं।

अच्छा होता कि डॉ. अंसारी यह घोषणा करते कि सेवा निवृत्त होकर, वे अल्पसंख्यक समाज में आ रही, कुरीतियों और आतंकवादी सोच के खिलाफ लड़ेंगे, जिससे वे इन भटके हुए युवाओं को राष्ट्र की मुख्य धारा में ला सके। पर ऐसा कुछ भी उन्होंने नहीं कहा और न करेंगे। यह भी चिंता का विषय है कि जिस तरह हिंदू युवा उत्साह के अतिरेक में बिना तथ्यात्मक ज्ञान के भावनात्मक मुद्दों पर, बार-बार उत्तेजित हो रहे हैं, उससे हिंदू समाज की छवि खराब हो रही है। वैदिक संस्कृति की जड़े इतनी गहरी है कि ऐसे हल्के-फुल्के झोंकों से हिलने वाली नहीं। आवश्यक्ता है, उन्हें गहराई से समझने और दुनिया के सामने तार्किक रूप से प्रस्तुत करने की। जिससे विधर्मी भी हमारे ऋषियों की दूर्दृष्टि, वैज्ञानिक सोच और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से प्रभावित होकर, भारत की मुख्यधारा में और भी सक्रिय भूमिका निभायें। डॉ. अंसारी को अभी भी कुछ ऐसा ही करना चाहिए। जिससे समाज को लाभ मिले और इस वकतव्य के बाद उनकी खोई हुई प्रतिष्ठा, पुनर्स्थापित हो। डॉ. ऐपीजे कलाम उस अखिल भारतीय सनातन सोच की दीप स्तंभ हैं और इसलिए भारतीयों के हृदय में स्थान पा चुके हैं। उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा। लेकिन एक सच्चे भारतीय की तरह सामाजिक सद्भाव से जीने का उदाहरण प्रस्तुत किया।

PRESS RELEASE OF AETM 2018

Research education is having an ageless impression for its most dynamic future and it is exclusively notable for the researchers to find the indelible discovery. 4th International Conference on Advancements in Engineering, Technology and Management has taken place at “The Ten, Eastin Hotel, Makassan, Bangkok, Thailand,

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चुनावी माहौल में उलझते बुनियादी सवाल

2019 के चुनावों की पेशबंदी शुरू हो गयी है। जहां एक तरफ भाजपा भविष्य के खतरे को देखते हुए रूठे साथियों को मनाने में जुटी है, वहीं विपक्षी दल आपसी तालमेल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। दोनों ही पक्षों की तरफ से सोशल मीडिया पर मनोवैज्ञानिक युद्ध जारी है। जहां भाजपा का सोशल मीडिया देशवासियों को मुसलमानों का डर दिखाने में जुटा है, वहीं  विपक्षी मीडिया, जो अभी कम आक्रामक

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मोदी जी की साफ नीयत: सही विकास

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