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हमारे देश में अगर कोई सबसे अधिक मेहनत करता है, तो वो इस देश के किसान हैं, जो दिन-रात, जाड़ा, गर्मी और बरसात झेलकर फसल उगाते हैं और 125 करोड़ देशवासियों का पेट भरते हैं। लेकिन सबसे ज्यादा उपेक्षा भी उनकी ही होती है। चुनावों के माहौल में हर राजनैतिक दल किसानों के दुख-दर्द का रोना रोता है और ये जताने की कोशिश करता है कि मौजूदा सरकार

के शासन में किसानों का बुरा हाल है और वो आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। जबकि हकीकत यह है कि वही राजनैतिक दल जब सत्ता में होते हैं, तो ऐसी नीतियां बनाते हैं, जिनसे किसान की तरक्की हो ही नहीं सकती। चाहे वह बिजली की आपूर्ति हो या सिंचाई के जल की, चाहे वह समर्थन मूल्य की बात हो या खाद के दाम की। हर नीति की नींव में एक बड़ा घोटाला छिपा होता है। जिसका खामियाजा, इस देश के करोड़ों किसानों को झेलना पड़ता है। जबकि इन नीतियों को बनाने वाले नेता और अफसर, मोटी चांदी काटते हैं।


दरअसल किसानों के प्रति उपेक्षा का ये भाव सत्ताधीशों का ही नहीं होता, हम सब शहरी लोग भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। अब मीडिया को ही ले लीजिए, अखबार हो या टी.वी., कुल खबरों की कितनी फीसदी खबर, किसानों की जिंदगी पर केंद्रित होती हैं? सारी खबरें औद्योगिक जगत, बहुर्राष्ट्रीय कंपनियां, सिनेमा या खेल पर केंद्रित होती है। किसानों पर खबर नहीं होती, किसान खुद खबर बनते हैं, जब वे भूख से तड़प कर मरते हैं या कर्ज में डूबकर आत्महत्या करते है।


ये कैसा समाजवाद है? कहने को श्रीमती गांधी ने भारतीय संविधान में संशोधन करके समाजवाद शब्द को घुसवाया। पर क्या यूपीए सरकार की नीतियां ऐसी थीं कि किसानों की दिन-दूगनी और रात-चैगुनी तरक्की होती? अगर ऐसी हुआ होता, तो किसानों की हालत इतनी खराब कैसे हो गयी कि वे आत्महत्या करने पर मजबूर हो गये? ये रातों-रात तो हुआ नहीं, बल्कि वर्षों की गलत नीतियों का परिणाम है। हमारी सरकारों ने किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की बजाए, याचक बना दिया। ताकि वो हमेशा सत्ताधीशों के सामने हाथ जोड़े खड़ा रहे। छोटे-छोटे कर्जों में डूबा किसान तो अपनी इज्जत बचाने के लिए आत्महत्या करता आ रहा है, पर क्या किसी उद्योगपति ने बैंकों का कर्जा न लौटाने पर आत्महत्या की? लाखों-करोडों का कर्जा उद्योग जगत पर है। पर उन्हें आत्महत्या करने की जरूरत नहीं पड़ती। क्योंकि वे मंहगे वकील खड़े करके, बैंकों को मुकदमों में उलझा देते हैं। जिसमें दशकों का समय यूं ही निकल जाता है।


प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लग रहा है कि उनकी परोक्ष मदद के कारण अंबानी और अडानी की प्रगति दिन-दूनी और रात-चैगुनी हो रही है। पर क्या ये बात किसी से छिपी है कि पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में भी अंबानी समूह की बेइंतहां वृद्धि हुई? सारा औद्योगिक जगत ये तमाशा देखता रहा कि कैसे सरकार से निकटता का लाभ लेकर, धीरूभाई अंबानी ने ये विशाल साम्राज्य खड़ा कर लिया था।  इसमें नया क्या है?


मैं पूंजीवाद के खिलाफ नहीं हूं। मैं मानता हूं कि व्यक्तिगत पुरूषार्थ के बिना, आर्थिक प्रगति नहीं होती। सरकारों की सहायता पर पलने वाला समाज कभी आत्मविश्वास से नहीं भर सकता। वह हमेशा परजीवि बना रहेगा। साम्यवादी देश इसका स्पष्ट उदाहरण है। जबकि पूंजीपति बुद्धि लगाता है, मेहनत करता है, खतरे मोल लेता है और दिन-रात जुटता है, तब जाकर उसका औद्योगिक साम्राज्य खड़ा होता है। इसलिए पूंजीपतियों की प्रगति का विरोध नहीं है। विरोध है, उनके द्वारा गलत तरीके अपनाकर धन कमाना और टैक्स की चोरी करना। इससे समाज का अहित होता है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ऐसी व्यवस्था लाना चाह रहे हैं, जिससे टैक्स की चोरी भी न हो और लोग अपना आर्थिक विकास भी कर सकें। इस तरह सरकार के पास, सामाजिक कार्यों के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध हो जायेंगे।

 
हर परिवर्तन कुछ आशंका लिए होता है। ढर्रे पर चलने वाले लोग, हर बदलाव का विरोध करते हैं। परंतु बदलाव अगर उनकी भलाई के लिए हो, तो क्रमशः उसे स्वीकार कर लेते हैं। आज देश के समझदार लोगों को किसानों और देश की आर्थिक स्थिति पर मंथन करना चाहिए और ये तय करना चाहिए कि भारत का आर्थिक विकास किस माडल पर होगा? क्या देश का केवल औद्योगिकरण होगा या किसानों मजदूरों के आर्थिक उत्थान को साथ लेकर चलते हुए औद्योगिक विकास होगा? क्योंकि समाज के बहुसंख्यक लोगों को अभावों में रखकर मुट्ठीभर लोग वैभव पर एकाधिकार नहीं कर सकते। उन्हें गांधी जी के ‘ट्रस्टीशिप’ वाले सिद्धांत को मानना होगा। जिसका मूल है कि धन इसलिए कमाना है कि हम समाज का भला कर सकें। ऐसी सोच विकसित होगी, तो किसान भी खुश होगा और शेष समाज भी।

 

भारत के आर्थिक विकास के माडल पर बहुत कुछ सोचा-लिखा जा चुका है। उसी पर अगर एकबार फिर मंथन कर लिया जाए, तो तस्वीर साफ हो जायेगी। जरूरत है कि हम विकास के पश्चिमी माडल से हटकर देशी माडल को विकसित करें, जिसमें सबका साथ हो-सबका विकास हो।

True Love


My Perception:----The whole world is based on Love and EMOTIONs.It is Emotions that rule the world and everyone in the world is EMOTIONAL.I encourage Love marriages.
Introduction:---
The word LOVE can have a variety of meanings in different contexts.

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PRESS RELEASE OF AETM 2018

Research education is having an ageless impression for its most dynamic future and it is exclusively notable for the researchers to find the indelible discovery. 4th International Conference on Advancements in Engineering, Technology and Management has taken place at “The Ten, Eastin Hotel, Makassan, Bangkok, Thailand,

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चुनावी माहौल में उलझते बुनियादी सवाल

2019 के चुनावों की पेशबंदी शुरू हो गयी है। जहां एक तरफ भाजपा भविष्य के खतरे को देखते हुए रूठे साथियों को मनाने में जुटी है, वहीं विपक्षी दल आपसी तालमेल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। दोनों ही पक्षों की तरफ से सोशल मीडिया पर मनोवैज्ञानिक युद्ध जारी है। जहां भाजपा का सोशल मीडिया देशवासियों को मुसलमानों का डर दिखाने में जुटा है, वहीं  विपक्षी मीडिया, जो अभी कम आक्रामक

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