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Social Issues

 "One of the things I learned is that you've got to deal with the underlying social problems if you want to have an impact on crime - that it's not a coincidence that you see the greatest amount of violent crime where you see the greatest amount of social dysfunction". - Eric Holder

 

 

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एस.सी / एस.टी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के एक संशोधन के बाद कुछ दलित संगठनों द्वारा आज भारत बंद के आह्वान का समर्थन वस्तुतः क़ानून के राज का निषेध है। दलितों के अधिकार और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए बनाया गया यह कानून एक प्रगतिशील और ज़रूरी कदम था, लेकिन सच यह भी है कि इस क़ानून का दुरूपयोग भी बहुत हुआ है। इस क़ानून का ही क्यों, आई.पी.सी की धाराओं

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हमारे देश में कैंसर रोगियों की बढ़ती संख्या के मद्देनज़र विख्यात प्राकृतिक चिकित्सक और चिकित्सा लेखक डॉ अबरार मुल्तानी ने सरकार की कैंसर नीति के बारे में कुछ बहुत ज़रूरी सवाल उठाए हैं जिनपर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। सरकारी विज्ञापनों को देखें तो महसूस होगा कि कैंसर का एकमात्र या उसका सबसे बड़ा कारक तम्बाकू है। यह एक अर्द्धसत्य है।

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कभी आपने सोचा है कि कुछ अपवादों को छोड़कर सृष्टि के समय से लेकर आजतक हमारी दुनिया इस क़दर अराजक, अव्यवस्थित, क्रूर और अमानवीय क्यों रही है ? किसी भी युग में झांककर देखिए तो ऐसा नहीं लगेगा कि यह दुनिया कभी जीने के लायक भी रही है। वह शायद इसीलिए कि दुनिया को बनाने, चलाने और मिटाने वाला ईश्वर हमेशा से पुरुष रहा है।

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2014 में जब नरेन्द्र मोदी पूर्णं बहुमत लेकर सत्ता में आऐ, तो सारी दुनिया के हिंदुओं ने खुशी मनाई कि लगभग 1000 साल बाद भारत में हिंदू राज की स्थापना हुई है। नरेन्द्र भाई का व्यक्तिगत जीवन आस्थावान रहा है। हिमालय में तप करने से लेकर भारत की सनातन परंपराओं के प्रति उनकी आस्था ने भारत को हिंदू राष्ट्र बनने की संभावनाओं को बढ़ा दिया। पर आज हिंदू राष्ट्र का सपना

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आज इक्कीसवीं सदी में भी काल्पनिक जातीय स्वाभिमान की बुनियाद पर खड़ी करणी सेना जैसी जातीय सेनाओं से जैसी मूर्खता और उद्दंडता की उम्मीद होती है, वह वैसा ही आचरण कर रही है। घटनाक्रम का दुखद पक्ष यह है कि करणी सेना के बहाने समूची राजपूत जाति को कायर बताकर लांछित और कलंकित करने का सुनियोजित अभियान सोशल मीडिया पर चलाया जा रहा है।

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हमारे पुराणों में वर्णित समुद्र-मंथन या अमृत-मंथन कोई अलौकिक घटना नहीं, सामंतों और संपन्न व्यवसायी वर्ग द्वारा मेहनतकशों के शोषण का आख्यान है। प्राचीन भारत में उत्तर तथा पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में रहने वाली आर्य जातियां अपने को देव कहती थीं। पूर्वी और दक्षिणी भारत में अपने विस्तार के क्रम में उनका उन क्षेत्रों के मूल निवासी असुर, नाग, दैत्य, दानव

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विचित्र लगता है कि बिहार में देवी का एक ऐसा मंदिर भी है जिसमें स्त्री-शक्ति के सम्मान के नौ दिवसीय पर्व नवरात्रि का आरम्भ होते ही स्त्रियों का प्रवेश वर्जित हो जाता है। यह मंदिर है बिहार के नालंदा जिले में बुद्ध की कर्मभूमि राजगीर और महावीर के निर्वाण-स्थल पावापुरी के बीच ग्राम घोसरावां स्थित माता आशापुरी मंदिर। मगध साम्राज्य के पाल काल में

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राष्ट्रवाद और देशभक्ति की लगातार उटपटांग परिभाषाएं गढ़ने वाले कथित राष्ट्रवादी इन दिनों देश के मुसलमानों और खुद को धर्मनिरपेक्ष मानने वाले लोगों से एक सवाल अक्सर पूछते हैं - धर्म बड़ा या देश ? सोशल मीडिया उनकी ऐसी जिज्ञासाओं से पटा हुआ मिलता है। इस सवाल के पीछे कोई दृष्टि अथवा जिज्ञासा नहीं, चिढ़ाने की भावना ही ज्यादा होती है।

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केंद्र और राज्य की सरकारें, हमारे धर्मक्षेत्रों को सजाए-संवारे तो सबसे ज्यादा हर्ष, हम जैसे करोड़ों धर्म प्रेमियों को होगा। पर धाम सेवा के नाम पर, अगर छलावा, ढोंग और घोटाले होंगे, तो भगवान तो रूष्ट होंगे ही, भाजपा की भी छवि खराब होगी। इसलिए हमारी बात को ‘निंदक नियरे राखिए’ वाली भावना से अगर उ.प्र. के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी जी सुनेंगे, तो उन्हें लोक और परलोक में यश मिलेगा।

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स्त्री-शक्ति के प्रति सम्मान के नौ दिवसीय पर्व शारदीय नवरात्र का आरम्भ हो रहा है। यह अवसर है नमन करने का उस सृजनात्मक शक्ति को जिसे ईश्वर ने स्त्रियों को सौंपा है। उस अथाह प्यार, ममता और करुणा को जो कभी मां के रूप में व्यक्त होता है, कभी बहन, कभी बेटी, कभी मित्र, कभी प्रिया और कभी पत्नी के रूप में।

नानक शाह फकीर फिल्म पर विवाद क्यों?

सिक्ख धर्म संस्थापक परमादरणीय गुरू नानक देव जी के जीवन व शिक्षाओं पर आधारित फिल्म ‘नानक शाह फकीर’ काफी विवादों में है। सुना है कि शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी और कुछ सिक्ख नेता इसे रिलीज नहीं होने देना चाहते। उनका कहना है कि गुरू नानक जी पर फिल्म नहीं बनाई जा सकती । क्योंकि उनका किरदार कोई मनुष्य नहीं निभा सकता।

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राजनीति से असली मुद्दे नदारद

देश में हर जगह कुछ लोग आपको ये कहते जरूर मिलेंगे कि वे मोदी सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं हैं क्योंकि मजदूर किसान की हालत नहीं सुधरी, बेरोजगारी कम नहीं हुई, दुकानदार या मझले उद्योगपति अपने कारोबार बैठ जाने से त्रस्त हैं, इन सबको लगता है कि 4 वर्ष के बाद भी उन्हें कुछ मिला नहीं बल्कि जो उनके पास था, वो भी छिन गया। जाहिर है

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Ishika Mukherjee: new sensation

In this dreamy ideology a number of enriched vocalists have produced their remarkable stature of voice in engaging our national legacy already. Respected “Ishika Mukherjee” is one of them. She is the real iconic personality our “City of Joy”, Kolkata has ever produced not only to enlist her leading articulations but to pay her

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