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हमारे पुराणों में वर्णित समुद्र-मंथन या अमृत-मंथन कोई अलौकिक घटना नहीं, सामंतों और संपन्न व्यवसायी वर्ग द्वारा मेहनतकशों के शोषण का आख्यान है। प्राचीन भारत में उत्तर तथा पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में रहने वाली आर्य जातियां अपने को देव कहती थीं। पूर्वी और दक्षिणी भारत में अपने विस्तार के क्रम में उनका उन क्षेत्रों के मूल निवासी असुर, नाग, दैत्य, दानव

जैसी जाति के लोगों से संघर्ष हुआ। हजारों साल तक वर्चस्व के लिए चले इस संघर्ष को पुराणों में देवासुर संग्राम कहा गया है।

विलासी और कर्मकांडी देवों की तुलना में पूर्व और दक्षिण भारत के मूलनिवासी ज्यादा परिश्रमी, बलशाली और पराक्रमी हुआ करते थे। इस संघर्ष में कई बार असुर राजाओं ने देवों को पराजित कर उनके वैभवशाली स्वर्ग पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। देव उनकी तुलना में ज्यादातर असहाय और अपनी सहायता के लिए ब्रह्मा, विष्णु, शिव या देवी दुर्गा के आगे गिड़गिड़ाते ही नज़र आते हैं। तत्कालीन आर्य राजाओं और व्यापारियों के समुद्र पार के देशों से व्यापारिक संबंध थे। भारतीय धर्मग्रंथ और पुराण व्यापार के सिलसिले में आर्यों की समुद्र-यात्राओं के असंख्य दृष्टान्तों से भरे हुए हैं। इन यात्राओं में पूजा-पाठ करने वाले पुरोहित और उस युग के वैज्ञानिक माने जाने वाले ऋषि-मुनि भी शामिल होते थे। इन व्यापारिक यात्राओं में अर्जित संपत्ति को समुद्री दस्युओं या जंगलों और पहाड़ों में असुर, दानव या दैत्य कहे जाने वाले लोगों द्वारा लूटने की असंख्य घटनाएं भी वेदों और पुराणों में दर्ज़ हैं। ऋगवेद तो इन दस्युओं को दी जाने वाली गालियों और शापों से भरा हुआ है। व्यापार के दूर देशों तक फैलाव के साथ इन समुद्र-यात्राओं में सुरक्षा के लिहाज़ से आरामतलब देवों ने अपनी सहायता के लिए जीवट श्रमिकों, नौकायन के विशेषज्ञों और दस्युओं से मुकाबले में सक्षम असुर, दानव और नाग जाति के कुछ प्रखर योद्धाओं को शामिल करने की ज़रुरत महसूस की। समुद्र-मंथन कहे जाने वाले समुद्र में अबतक के सबसे बड़े अभियान में अपने व्यापारिक हित में विष्णु की सलाह से देवराज इंद्र को बेमन से ही सही, पहली बार असुर राज बलि से संधि करनी पड़ी।

देव और असुरों ने मंदराचल पर्वत को मथनी अर्थात केंद्र तथा नाग जाति के प्रचण्ड योद्धा बासुकी को रस्सी यानी पथ-प्रदर्शक बनाकर लंबी समुद्र यात्राएं आरम्भ की। लंबे समय तक चली इस यात्रा में उन्हें ढेर सारी संपत्ति के अलावा चौदह अनमोल रत्न - कामधेनु गाय. उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, अप्सरा रम्भा, लक्ष्मी, वारुणी, चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष, शंख, अमृतघट, वैध धन्वन्तरि और हलाहल भी मिले। जब देवों और असुरों के बीच रत्नों के बंटवारे का समय आया तो देवता बेईमानी और छल पर उतर आए। सुंदरी लक्ष्मी और कौस्तुभ मणि का विष्णु ने वरण कर लिया। कामधेनु गाय देवों की प्रशस्ति गाने वाले ऋषि-मुनियों को दे दी गई। ऐरावत हाथी, कल्पवृक्ष और सुंदरी रंभा को इंद्र ने रख लिया। उच्चैःश्रवा घोड़ा सूर्य के हिस्से में आया। संसार को विष के घातक प्रभाव से बचाने के लिए देवों और असुरों में समान रूप से प्रिय शिव को हलाहल का पान करना पड़ा। असुर, दानव, दैत्य और नाग जाति के लोगों के हाथ सिर्फ वारुणी लगी। जब अमरत्व प्रदान करने वाले अमृत-घट के साथ वैद्यराज धन्वंतरि प्रकट हुए तो अबतक के बंटवारे से असंतुष्ट असुरों ने उनसे अमृत-घट छीन लिया। अमृत-पान के लिए असुरों में आपस में ही संग्राम छिड़ गया। विष्णु ने मोहिनी रूप धरकर देवों और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बिठाया और असुरों को भ्रमित कर देवों को अमृत पिलाना शुरू कर दिया। देवताओं की यह चाल दैत्य राहु को समझ आ गई। उसने देवता के रूप में उनकी पंक्ति में बैठकर बस थोड़ा-सा अमृत ही चखा था कि अमृत के गले के नीचे उतरने के पहले ही विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया।

समुद्र मंथन की इस कथा को देवों द्वारा पालित पुरोहितों और ऋषियों ने कुछ इस एकतरफा और चमत्कारिक तरीके से प्रस्तुत किया है कि हम इसे अपने देवताओं के अलौकिक और न्यायपूर्ण कृत्य के रूप में देखते रहे हैं। दुर्भाग्य से देश की अनार्य जातियों ने अपना इतिहास स्वयं नहीं लिखा। या शायद उनका लिखा हुआ कालांतर में नष्ट हो गया अथवा नष्ट कर दिया गया। समद्र मंथन की इस एकपक्षीय कथा को मानवीय और वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह शोषण और छल की शाश्वत कथा के सिवा कुछ भी नहीं। शाश्वत कथा इसीलिए कि शोषण का यह सिलसिला निर्विघ्न रूप से तब से आज तक ज़ारी है। फर्क इतना है कि आधुनिक भारत में देवों की जगह सत्ताधारियों, सत्ता के दलालों, पूंजीपतियों, कारपोरेट घरानों और अफसरशाहों ने ले ली है। इन एक प्रतिशत से भी कम लोगों ने देश की नब्बे प्रतिशत संपत्ति और संसाधनों पर छल-बल से कब्ज़ा किया हुआ है। देश के निर्माण में लगे श्रमिकों, अन्नदाता किसानों, कुशल कारीगरों और बड़े औद्योगिक तथा व्यावसायिक घरानों को जीविका के लिए अपनी बौद्धिक क्षमता बेचने वाले मध्यवर्गीय लोगों की हालत क्या आज असुरों, दानवों, दैत्यों और नागों से बेहतर है ? अपना अधिकार मांगने वालों का हश्र आज भी तो वही होता है जो राहु का हुआ था।

 

Courtesy: Dhruv Gupt

PRESS RELEASE OF AETM 2018

Research education is having an ageless impression for its most dynamic future and it is exclusively notable for the researchers to find the indelible discovery. 4th International Conference on Advancements in Engineering, Technology and Management has taken place at “The Ten, Eastin Hotel, Makassan, Bangkok, Thailand,

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चुनावी माहौल में उलझते बुनियादी सवाल

2019 के चुनावों की पेशबंदी शुरू हो गयी है। जहां एक तरफ भाजपा भविष्य के खतरे को देखते हुए रूठे साथियों को मनाने में जुटी है, वहीं विपक्षी दल आपसी तालमेल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। दोनों ही पक्षों की तरफ से सोशल मीडिया पर मनोवैज्ञानिक युद्ध जारी है। जहां भाजपा का सोशल मीडिया देशवासियों को मुसलमानों का डर दिखाने में जुटा है, वहीं  विपक्षी मीडिया, जो अभी कम आक्रामक

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मोदी जी की साफ नीयत: सही विकास

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